Image - 2026-05-21 22:48
एक बार की बात है, सलमान अल-फ़ारसी के गाँव में 13 साल का एक लड़का रहता था — उसका नाम था हमज़ा। हमज़ा बहुत बहादुर था, लेकिन उसका दिल बहुत नरम था। वह हमेशा बुज़ुर्गों की मदद करता और छोटे बच्चों को कुरआन पढ़ना सिखाता। गाँव के पास एक बड़ा जंगल था। लोग कहते थे कि वहाँ रात को अजीब आवाज़ें आती हैं और जो भी अंदर गया, डरकर वापस लौट आया। इसलिए गाँव वाले बच्चों को वहाँ जाने से मना करते थे। एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और आसमान नारंगी रंग का हो गया था, गाँव में अचानक हलचल मच गई। एक छोटी बच्ची, आयशा, जंगल के पास खेलते-खेलते गायब हो गई थी। आयशा की माँ रो रही थी। “कोई मेरी बेटी को ढूँढ लाओ…” लेकिन अंधेरा बढ़ रहा था। कोई भी जंगल में जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था। हमज़ा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे भी डर लग रहा था। जंगल का नाम सुनकर उसके हाथ काँप रहे थे। लेकिन उसे अपने उस्ताद की बात याद आई: “अल्लाह पर भरोसा करने वाला इंसान डर से भागता नहीं, सही काम करता है।” हमज़ा ने गहरी साँस ली और कहा, “मैं आयशा को ढूँढने जाऊँगा।” लोग हैरान रह गए। “तुम अभी बच्चे हो!” एक आदमी बोला। लेकिन हमज़ा ने जवाब दिया, “अगर हम डर की वजह से किसी की मदद ना करें, तो बहादुरी का क्या मतलब?” उसने एक छोटी लालटेन उठाई और “बिस्मिल्लाह” पढ़कर जंगल की तरफ चल पड़ा। जंगल बहुत डरावना था। हवा पेड़ों को हिला रही थी। कहीं उल्लू की आवाज़ आती, कहीं सूखी टहनियाँ टूटतीं। हर आवाज़ हमज़ा के दिल की धड़कन तेज़ कर देती। अचानक उसे झाड़ियों के पीछे से हल्की रोने की आवाज़ सुनाई दी। “बचाओ…” वह तुरंत उस तरफ दौड़ा। वहाँ आयशा बैठी थी। उसका पैर एक बड़े पत्थर में फँस गया था। वह रो रही थी। “डरो मत,” हमज़ा ने कहा, “मैं तुम्हें घर ले जाऊँगा।” लेकिन तभी पास की झाड़ियों में तेज़ हलचल हुई। गुर्ररर… एक बड़ा जंगली भेड़िया बाहर निकला। उसकी आँखें अंधेरे में चमक रही थीं। आयशा डर के मारे चीख पड़ी। हमज़ा के पैरों में भी डर दौड़ गया। वह भाग सकता था… लेकिन अगर वह भागता, तो आयशा अकेली रह जाती। उसने दिल में दुआ पढ़ी: “हसबुनल्लाहु वा नि'मल वकील…” फिर उसने लालटेन को ऊँचा उठाया और ज़ोर से चिल्लाया। भेड़िया कुछ पल रुका। हमज़ा ने पास की जलती हुई लकड़ी उठाई और धीरे-धीरे आगे बढ़ा। आग देखकर भेड़िया पीछे हटने लगा… फिर अचानक मुड़कर जंगल में भाग गया। आयशा की आँखों में आँसू थे। “तुम बहुत बहादुर हो…” हमज़ा मुस्कुराया। “बहादुर वो नहीं जिसे डर नहीं लगता… बहादुर वो है जो डर के बावजूद सही काम करे।” उसने आयशा को सहारा दिया और दोनों धीरे-धीरे गाँव लौट आए। गाँव वाले खुशी से रो पड़े। आयशा की माँ ने हमज़ा को गले लगा लिया। उस रात गाँव के इमाम ने सब बच्चों से कहा: “सच्ची बहादुरी ताकत में नहीं, अच्छे दिल और अल्लाह पर भरोसे में होती है।” उस दिन के बाद, गाँव के बच्चे हमज़ा जैसा बनना चाहते थे — बहादुर, दयालु और नेक। और हमज़ा? वह हर रात सोने से पहले यही दुआ करता: “या अल्लाह, मुझे हमेशा सही काम करने की हिम्मत देना।” सीख: डर लगना गलत नहीं है। लेकिन डर की वजह से सही काम छोड़ देना गलत है। जो इंसान अल्लाह पर भरोसा करके दूसरों की मदद करता है, वही असली बहादुर होता है।
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